तीसरी बार वही बच्चा
एक बस में पेन बेचते बच्चे की कहानी और जवाबदेही से भागता तंत्र.. बाल सुरक्षा कानूनों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई।
संपादकीय सूचना: यह विवरण एक युवा स्वयंसेवक तथा बागपत के युवाओं के प्रेरणा स्रोत, अमन भाई द्वारा साझा किया गया है। उन्होंने इस घटना को स्वयं प्रत्यक्ष रूप से देखा है। इसे मैं उनके मूल शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ, क्योंकि यह कहानी बिना किसी संपादन के सुनी जानी चाहिए।
उसका नाम श्याम है।
एक बच्चा जो बस में पेन बेच रहा था, उससे यह मेरी दूसरी बार टकराव था। पिछली बार वह मुझसे 6 महीने पहले इसी बस स्टॉप के पास बस में पेन बेचता हुआ मिला था। आज फिर मिला तो मैने झट से इसका फोटो खींचने का प्रयास किया तो यह दृश्य उभर आया।
जरा सोचिए कि इन 6 महीनों में कितने हजारों लोगों ने उस बच्चे को देखकर नजरे फेरी होगी, बच्चों की सुरक्षा शिक्षा स्वास्थ्य पोषण हेतु जिम्मेदार लोग उस बच्चे तक नहीं पहुंच सके।
मैंने उसी समय चाइल्ड हेल्पलाइन पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना चाहा तो उसमें तकनीकी समस्या थी और शिकायत जमा नहीं हो रही थी। इसके बाद घर आकर भारत सरकार के सीपीग्राम पोर्टल पर विभिन्न संबंधित मंत्रालयों को इस घटना से अवगत कराया।
लगभग एक महीने बाद यूपी सरकार के परिवहन विभाग तक दिल्ली से चिट्ठी पहुंची तो मेरे पास कॉल आया और मैंने उनसे बात की तो उनका कहना है कि हम इसमें क्या कर सकते है बच्चे को बस में चढ़ने से नहीं रोक सकते।
खैर जैसे तैसे उन्हें मनाया कि भाई अपने बस ड्राइवर कंडक्टर को बस रूट पर कार्यरत चाइल्ड हेल्पलाइन लोकल टीम के नंबर देकर तैयार बनाओ और उन्हें प्रशिक्षण भी दो। लेकिन यह सुझाव शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने बोल दिया कि लिस्ट भी आपको ही देनी होगी। मैंने कई जगह बात की। राज्य बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष से बात की तो बोलते है कि हमारा कार्यकाल समाप्त होने वाला है इसलिए हम सूची आपको नहीं देंगे लेकिन आप कार्य करते रहे बधाई।
स्थानीय विभाग में संपर्क किया तो उन्हें कार्य का क्रेडिट लेने अखबार में छपने से फुर्सत ही नहीं। कहीं से जैसे तैसे सूची लेकर उन्हें भेजी तो उन्होंने फिर शिकायत पर कोई अपडेट नहीं दिया और फोन उठाना बंद कर दिया।
लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात है कि आज तीसरी बार वही बच्चा मुझे बस में पेन बेचता मिला। लेकिन कागजों पर मौजूद कानून और बस में पेन बेचता वह बच्चा — दोनों के बीच की दूरी कितनी बड़ी है?
सच्चाई यह है कि कानून अक्सर वहां तक नहीं पहुंचते जहां तक भूख पहुंच जाती है।
हम अक्सर कहते हैं — “गरीबी है इसलिए बच्चा काम कर रहा है। पर यह आधा सच है।
सरकार के आंकड़ों में वह बच्चा “स्कूल नामांकित” दिख सकता है, भले ही वह रोज स्कूल न जाता हो। यानी बच्चा सिर्फ परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि समाज की सुविधा का हिस्सा भी बन जाता है। यह कड़वा है, पर सच्चा है।
यह भी एक कम चर्चित सच है कि कई बार बच्चों को संगठित रूप से भीख या सामान बेचने के लिए लगाया जाता है। कुछ मामलों में यह मानव तस्करी, गिरोह या पारिवारिक दबाव का हिस्सा होता है। सड़क पर दिखने वाला हर बच्चा “स्वतंत्र छोटे व्यापारी” नहीं होता।
यहां सवाल और गहरा हो जाता है — अगर वह बच्चा किसी नेटवर्क का हिस्सा है, तो क्या हमने उसकी सुरक्षा के लिए सही कदम उठाए?
यह सवाल उठता है — अगर वह बच्चा छह महीने पहले भी वहीं था और आज भी वहीं है, तो स्थानीय तंत्र तक सूचना क्यों नहीं पहुंची?
कारण कई हो सकते हैं: शिकायत तंत्र की जटिलता, “यह तो रोज होता है” वाली मानसिकता, अधिकारियों की सीमित पहुंच या फिर डेटा और जमीन की सच्चाई के बीच खाई।
कभी-कभी सिस्टम में इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि निगरानी की निरंतरता की कमी होती है।
मैं स्वयं ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूं।
मैं जानता हूं कि कई बार बच्चे पढ़ना चाहते हैं, पर परिस्थितियां उन्हें रोक देती हैं।
यह बच्चा “अयोग्य” नहीं है। वह “अनदेखा” है। उसके भीतर भी वही संभावनाएं हैं जो किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र में होती हैं। फर्क सिर्फ अवसर का है।